मै कोई लेखक नही किन्तु समाज में जो कुछ घटता है उससे इत्तफ़ाक जरूर रखता हूँ। मेरे पिछले लेख में दो टिप्पड़ी जो मेरे लिखने के काफी समय बाद आई थी। प्रथम टिप्पड़ी कहती है -
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आप दो नावों में एक साथ पैर रखने की कोशिश कर रहे हैं । पहले यह तो बताएँ कि आप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में हैं या विपक्ष में ।
यदि पक्ष में हैं तो दोनों विषयों में आपको कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।
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यदि विपक्ष में हैं तो दोनों समान रूप से निंदनीय हैं । "यह घटना इस्लामिक कट्टरवाद की ओर इशारा करता है" : तब आप यह नहीं कह सकते । यह बात कहकर आप अपने पक्षपाती रवैये का परिचय दे रहे हैं ।
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जब मै इस टिप्पड़ी को पड़ता हूँ तो पाता हूँ कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में मुझसे पूछा जाता है। मित्र मै बस यही कहना चाहूँगा कि अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता हर किसी को मिलती चाहिए, किन्तु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नंगी नही होनी चाहिए। क्या किसी की धार्मिक भावना का अपमान करना ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है? इस्लामिक कट्टरवाद आज चरम पर है और आप गुजरात जैसे अपवाद को छोड़ कर इस कौम पर टिप्पड़ी नही कर सकते है। आपको इस कौम के द्वारा या तो समाप्त कर दिया जायेगा या तो दबा दिया जायेगा। जहॉ तक पक्षपाती रवैया का प्रश्न है तो मुझे यह कहने में संकोच नही है कि मै हिन्दू है और जो भी इस देश में रहते है उनके पूर्वज हमारे आराध्य श्रीराम है। अगर सच कहना पक्षपाती होता है तो मुझे पक्षपाती कहा जा सकता है किन्तु मै यह मानने को तैयार नही हूँ किसी कि भावना को चोट पहुँचाना ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। इन ठेकेदारों की स्वतंत्रता तब कहॉं चली जाती है तब पैगम्बर का कार्टून ही बनाया जाता है जो कि अश्लील नही है। क्या पैगम्बर या इस्लाम इतना छुई मुई है कि वह इस छोटी सी घटना को लेकर आहत होता जाता है। क्या धर्मिक ठेस लगने और लगाने का ठेका इस्लाम ने ही ले रखा है? क्या हिन्दओं की धार्मिक भावना नही है? इस अभिव्यक्ति के ठेकेदार कहाँ थे जब कार्टून बनाने वाले की हत्या का फरमान छेड़ा गया था ?
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Sanjay Sharma said...
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इस टाइप की परिभाषा केवल जावेद अख्तर ,शबाना आज़मी या कोई अन्य मुस्लिम ही नही गढ़ते , हिंदू सबसे आगे है मकबूल के बचाव मे! अखबार मे टीवी पर ब्लॉग मे हर जगह नाम से हिंदू दिखने वाला ज्यादा मात्रा मे माँ के नग्नता का समर्थक है .हमे कुछ ख़ास नही इन समर्थक को नंगा करते रहना है बस . सब लाईन पर आ जायेंगे .
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भाई आप का कहना बिल्कुल सही है, आज जो भी स्थिति देखने को मिलती उससे यही लगता कि आज के दौर में सच्चाई का नाम
लेने वाला कोई नही रह गया है। आज का नेता वोट के कारण तुष्टिकारण की नीति अपनाता है तो पत्रकार भी कहीं हिन्दुवादी न कहनाने लगे इसलिये हरी मौलाना टोपी पहने से परहेत नही करते है। नेताओं को यही लगता कि मुसलमनों को अपने से सत्ता मिलती है और इसी कारण उनका इस्लाम प्रेम जाहिर होता है। इस्लाम का सर्मथन धर्मनिपेक्षता कहलाती है, अगर आप हिन्दुत्व की बात करों को धर्मनिपेक्षता का उल्लंघन होता है। भाई जी आपके बातो मे सच्चाई झलकती है आज नंगो का ही दौर जो जितना बड़ा नंगा है वह उतना बड़ा पपुलर कहलाता है। यही कारण है कि आज हर कोई नंगे(नग्न) कहलाने में गर्व और सर्मथन करता है। आज का समाज पत्रकारिता जगत को देख कर यही लगता कि वह नंगा तो नंगा अंधा भी है जो अपनी टीआरपी के लिये भद्दी-भद्दी तस्वीरों के प्रसारण करने में हिचकते नही है।
आज का वातावरण देखकर लगता है कि आज हिन्दुत्व की बात करना सम्प्रदायिकता है, और इस्लाम सर्मथन धर्मनिपेक्षता है। यह वातावरण बदलना होगा। इसे मुसलमानों के ठेकेदारों को समझना होगा। यह सम्भव नही है क्योकि यह भारत है जहॉं राम पर प्रश्नचिन्ह लगाया जा सकता है किन्तु इस्लाम या पैगम्बर पर नही। जिससे कि समाज को एक आँख से देखना होगा और मानना होगा कि धर्मिक अपमान राष्ट्रीय अपमान है चाहे वह देवी देवता हो या फिर पैगम्बर।
2 टिप्पणियाँ:
"क्या किसी की धार्मिक भावना का अपमान करना ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है?"
बिलकुल नहीं । हर प्रकार की स्वतंत्रता के साथ-साथ उससे सम्बद्ध सीमाएँ भी होती है । समाज में रहने वाले हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह उन सीमाओं को लाँघने की कोशिश न करे ।
"इन ठेकेदारों की स्वतंत्रता तब कहॉं चली जाती है तब पैगम्बर का कार्टून ही बनाया जाता है जो कि अश्लील नही है। क्या पैगम्बर या इस्लाम इतना छुई मुई है कि वह इस छोटी सी घटना को लेकर आहत होता जाता है।"
अब आप अपनी ही कही गयी बात को उलट रहे हैं । इस्लाम के लिए क्या अश्लील है क्या नहीं, कौन सी बात छोटी है कौन सी बड़ी, इसका निर्णय आप इस्लाम पर छोड़ दें ।
और हाँ, हिन्दू देवी देवताओं का नग्नीकरण निंदनीय था, है और रहेगा ।
मैं केवल आपसे अपने मापदंडों में समानता लाने की बात कह रहा हूँ । ज़रूरी नहीं जो आपके लिए सही या ग़लत हो वो दूसरे के लिए भी वही हो । लेकिन विचारों के इस अंतर को स्वीकार करना और उसका सम्मान करना ज़रूरी है ।
आप गुजरात जैसे अपवाद को छोड़ कर इस कौम पर टिप्पड़ी नही कर सकते है।
गुजरात में जो कुछ हुआ था एक सताये हुये समाज का जागरण था। इसे कट्टरता नही कह सहते हैं। इस विषय में ज्याद बात करनी हो तो मुझसे आप बात कर सकते हैं।
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