मैने कभी प्रत्यक्ष ब्लागिंग नही की, किन्तु मै हिन्दी चिट्ठाकारिता में तब से जुड़ा हुआ हूँ जब से प्रमेन्द्र-जीतेन्द्र चौधरी विवाद प्रारम्भ हुआ था। तब से लेकर आज तक यहीं समझ में आया कि ब्लाग कि मठाधीशी होती क्या है? तब और अब में कोई भी अन्तर नही आया। यह जरूर है कि मै ब्लागिंग से इतना नजदीक और हस्तक्षेप करने के बाद भी मैने कभी लेखन कार्य नही किया।
आज मेरा लेखन में आना भी इत्तफ़ाक है कि प्रमेन्द्र की परीक्षाओं के कारण ब्लागिंग से दूर रखने के लिये उसकी महाशक्ति को अपने कब्जे में लेना पड़ा, ताकि परीक्षा में ध्यान दे सकें। जैसा पहले ही मैने उल्लेख किया कि मेरा ब्लागिंग से दूरी रही है किन्तु प्रमेन्द्र के साथ हुऐ विवादों से नही, और यही कारण है कि आज हिन्दी ब्लागिंग की मठाधीशी के बारे में काफी कुछ पता है।
आज मै यह लेख न लिखता किन्तु विवश होना पड़ा, आज जगदीश भाटिया ने एक लेख लिख कर अपनी सफाई प्रस्तुत की थी कि मैने उक्त काम नही किया है। किन्तु जब मैने उस पर टिप्पणी की तो यह देखने में आया कि वह प्रकाशित नही हुई, जो भाटिया जी की दूरदर्शिता को दर्शाता है टिप्पणी प्रकाशन या अप्रकाशन भाटिया जी का निर्णय है किन्तु जो हुआ वह सोचने का विषय है। कि इतने बड़े-बडे महारथी भाटिया जी के सर्मथन में आ गये-
अब वह टिप्पणी आपके सामने है-
किसी एक एक को नही कह रहा हूँ, किन्तु खुरापात हुई तभी आव़ाज भी उठ रही है, नही तो किसी को सनक नही सवार होती है आरोप लगाने की।
चाहे दाल में कुछ काला हो या पूरी दाल ही काली हो यह दाल बानने वाले को ही पता होगा।
ब्लागवाणी पर देवाशीष जी की टिप्पणी में आपके प्रति किया जा रहा सर्मथन यह बताता है कि आप ताकनीकी जानकार नही है किन्तु चिट्ठाकारी के महाभारत में शिखड़ी को आगे खड़ा कर तीर चलाने वाले काफी धर्नुधर है।
अब वह आपके सर्मथन करने वाला भी हो सकता है।
हाल के दिनों में कुछ ऐसी घटनाएँ हुई है जो अपने आपको ब्लागिंग का दादा साबित करने और दर्शाने वाले कदम लगते है, इसकी चर्चा तो वही करेगा जिसके साथ घटना हुई है। किन्तु यह बात ध्यान रखना होगा कि जिसने भी अपने को हिन्दी ब्लाग का सम्प्रभु बताने की कोशिश की वह टिका नही और सम्प्रभुता दादागीरी से नही आती है। वक़्त है सुधरने और सामजस्य बिठाने का, दादागीरी पर टिकी विरासत का अधिपत्य लम्बा नही हुआ है।
3 टिप्पणियाँ:
28 January, 2008 20:06
मानवेन्द्र जी;
मेरा विश्वास है कि ये भूल conduit.com की ओर से ही हो सकती है. श्री जगदीश जी की ओर मेरी कभी भी शंका नहीं रही. इसीलिये उस पोस्ट में श्री जगदीश जी का नाम कहीं नहीं था.
आपके खून की गरमी देखकर मुझे अपनी युवावस्था के दिन याद आगये. कभी मैं भी आपकी तरह गरम खून वाला हुआ करता था.:)
अभी हिन्दी ब्लाग की दुनिया का दायरा फैलने का काम शुरू हुआ ही है. हमें आपको और सबको मिलकर बड़ा सफर तय करना है.
मुझे आपके लिखे लेखों की प्रतीक्षा रहेगी, रचनात्मक लेखन की जो आप अच्छी तरह लिख सकते हैं.
29 January, 2008 11:29
यहाँ मठाधीश है कौन? कोई नहीं.
29 January, 2008 13:55
हिन्दी ब्लाग्स में मठाधीशी समाप्त होने का नाम नही ले रही है, अभी कुछ दिनों पूर्व एक सज्जन ने अपने शक्ति का प्रर्दशन किया है,कि चिट्ठाकारिता को प्रभावित करने का माद्दा रखते है।
संजय भइया आपको लगता है कि मठाधीशी नही है किन्तु कुछ लोग है जो अपने व्यक्तिगत मतभेद को सार्वजनिक स्थानों पर जाहिर करते है।
मुझे जो कहना है मै 7 फरवरी को कहूँगा।
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