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संस्कार शिक्षा या सेक्स एजुकेशन

Sanskar Shiksha or Sex Education

 

पिछले सेक्‍स शिक्षा पर लेख पर श्री अरूण जी, श्री समीरलाल जी, श्री ज्ञानजी तथा श्री भुवनेश भाई की टिप्‍पणी मिली थी। जहाँ तक मै स्‍पष्‍ट कर दूँ कि सेक्‍स शिक्षा का विरोधी नही हूँ किन्‍तु सेक्‍स शिक्षा के नाम पर अवस्‍यको के प्रतिशिक्षा का विरोधी हूँ। अरूण जी का कहना ठीक है कि स्‍कूलों में सेक्‍स शिक्षा के नाम पर व्‍यापार केन्‍द्र खोलने का प्रयास किया जा रहा है। ज्ञान जी का कहना भी सही है कि यह एक व्‍यापक बहस का मुद्दा है और समीर लाल जी भी उनकी बात से सहमत है किन्‍तु भुव‍नेश भाई को नही लगता कि यह गलत कदम है।

 

उनका यह सोचना भी अपने जगह पर वाजिब है, उन्‍होने कई प्रश्‍न टिप्‍पणी में छोड़ रखे थे उन पर चर्चा करना जरूरी है मैने प‍िछले लेख में दो शब्‍दों का प्रयोग किया था हया और बेहया उस पर गौर किया जाना जरूरी था अगर उस पर गौर किया जाता तो यह तो काफी प्रश्नों के उत्‍तर मिल जाते किन्‍तु लगता है कि विश्लेषण करना जरूरी है। हम सभी उस दौर से गुजर चुके है मै भी शायद आप भी, किन्तु अपनी ज्ञान वृद्धि का कभी प्रदर्शन करने की सोच नही रखी कि जो पड़ा या देखा है उसका प्रयोगिक कार्य भी किया जाना चाहिऐ। इसी को शायद हया कहते है, कि हम अपने में विचार करने की क्षमता विकसित करते है। मस्‍तराम के किस्‍से तो मैने अपने प्रारम्भिक जीवन में तो अध्‍ययन नही किया क्‍योकि मुझे अपने विरासत में नही मिली हॉं यह जरूर है कि 9-12 तक की शिक्षा प्राप्‍त करने के दौरान काफी किस्‍से खाली पीरियड में कुछ मस्‍तरामों से सुनने को मिलते थे। यहॉं मैने विरासत शब्‍द का प्रयोग किया है बताना चाहूँगा कि अ‍श्लील साहित्‍य का विकास हमारे अपने घर से होता है जो एक भ्रत से दूसरे भ्रत के भी चोरी छिपे या प्रत्‍यक्ष रूप से होता है। अर्थात आज हमें यह स्‍वीकार करने में नही हिचकना चाहिऐ कि हम कितना भी अस्‍वीकार करें किन्‍तु सेक्स शिक्षा के केन्‍द्र अपने हमारे घर है। जहॉं पर यह साहित्‍य कभी न कभी मिल जाते है। स्‍नातक से आप वयस्‍कता का भी आसय ले सकते है। इन साहित्‍यों का पढ़ना बुरा नही है किनतु गढ़ना बुला और अपने जीवन में अपनाना। मस्‍तराम की पहली कहना मुझे ब्‍लागिंग में प्रवेश करने पर ही किन्‍तु र्दुभाग्‍य कि मेरे आते ही मस्‍तराम की कहनियॉं समाप्‍त हो गई :)

जहॉं तक अपने स्‍वीकार किया है कि आपसी सहमति से गॉंव की हरयाली मे में क्‍या-क्‍या हो रहा है? अर्थात आज सेक्‍स शिक्षा वक्‍त के साथ गॉंव में भी पहुँच गई है, जिन गॉंवों में बिजली और टीवी और भी बहुत कुछ नही है। तो बच्‍चों के मध्‍य यह शिक्षा लाना कितना उचित है। आम सहमति से किया गया कृत्‍य निनदनीय नही मानता हूँ, किन्‍तु यहॉं विरोध असहमति के बाद हुऐ कृत्‍य के बाद हत्‍या तक की स्थिति की निन्‍दा करता हूँ।

क्‍स शिक्षा लाने की अपेक्षा संस्‍कार शिक्षा लाये जाने की जरूरत है जहॉं बचपन से सुआचरण की पद्वति को लाया जा सके, हमारे पुराने ऋषि पद्वति में 25 वर्षो युवकों की काम भवना दबी रहती थी आज क्‍या कारण आ गया कि 8 से 17 वर्ष की आयु में यह अपने चरम पर पहुँच कर अप्रकृतिक कृत्‍य तक पहुँच जाती है। आज के दौर में यह परिवर्तन हमारे परिवेश में संस्‍कारों की कमी को दर्शाता है। आज जरूरत है कि हम अपने पीढ़ी को संस्‍कार शिक्षा देने का प्रयास करे न कि सेक्‍स शिक्षा। हो सकता हो कि सेक्‍स शिक्षा आज की जरूरत हो किन्‍तु इसे स्‍कूलों में देने के बाजय वयस्‍क शिक्षा केन्‍द्र के जरिये दिये जानी च‍ाहिए ताकि अगर संवाद बात आये तो शिक्षार्थी खुल का प्रश्‍न भी कर सकें यह न हो कि कोई ऐसा प्रश्‍न आये कि मास्टर जी उत्‍तर देने में शर्म महसूस करें।

भुवनेश भाई ने ''दूध का धुला'' शब्‍द का प्रयोग किया है। दूध का दुले मै ही नही, हमारे राष्‍ट्रपिता महात्‍मागांधी से लेकर आज तक की कई पीढ़ी बहुत से लोग नही होगे। यहॉं बात फिर आचरण को लेकर आ जाती है कि आप अपने व्‍यक्तिगत जीवन में किसने भी खराब क्‍यो न हो किन्‍तु आप व्‍यवहारिक जीवन में उसका प्रयोग न करे तो आप खराब नही है। काम सबन्‍धी विषय निश्चित रूप से चर्चा होनी च‍ाहिऐ किन्‍तु यह जरूरी है कि चर्चा का स्‍थान और चर्चाकारों की स्थिति कैसी है। समाज विकृतियों से भरा है इस विकृति को सिर्फ और सिर्फ संस्‍कार शिक्षा द्वारा दूर किया जा सकता है। यह एक गम्‍भीर ममला तभी तक है जब तक कि यह स्‍कूल तक सीमित है इसे वयस्‍क शिक्षा का रूप दिया जाना चाहिऐ। मै अभी भी कहूँगा कि अगर संस्‍कार शिक्षा की बात पर हम जोर दे तो वयस्‍क शिक्षा की बात भी समाप्‍त हो जाती है। सेक्‍स शिक्षा का प्रवाह समय के साथ अपने आप हो जायेगा, क्‍योकि न मुझे और हॉं तक मेरा अनुमान है कि आपने या ज्‍यादातर लोगों ने सेक्‍स की औपचारिक शिक्षा पाई है।

2 टिप्पणियाँ:

  Neeraj Rohilla

12 March, 2008 00:35

मस्तराम कितने लोगों को विरासत में मिलती है? इसके बारे में सभी स्कूल और आस पास से ही जानते हैं । इस बात से भी असहमत हूँ कि अश्लील साहित्य का विकास घरों से होता है । इसका विकास घरों से नहीं बल्कि हमउम्र लोगों से चुपके चुपके की गयी बातों और बहुत सारी अधकचरी जानकारी से होता है । अगर घरवालों, अध्यापकों से समय पर सही जानकारी मिल जाये तो उसकी नौबत ही न आये ।

स्नातक शिक्षा प्रारम्भ करने की औसत आयु १७-१८ वर्ष है और मैं मानता हूँ कि प्रारम्भिक यौन शिक्षा इससे पहले प्रारम्भ होनी चाहिये । हाँ, यौन शिक्षा का अगला चरण जैसे HIV के बारे में जानकारी, अन्य STD's जैसी अन्य बातों के बारे में जानकारी स्नातक स्तर पर दी जा सकती है ।

गाँव की हरियाली में जो हो रहा है उसकी शिक्षा स्कूलों में नहीं मिली है, बल्कि समुचित जानकारी का अभाव ऐसे में लडकी (विशेषकर) को निर्णय लेने के अधिकार से वंचित कर देता है । यौन शिक्षा के अभाव में ही हमारे समाज में कितने यौन अपराध होते रहते हैं और इसकी कभी शिकायत ही नहीं होती क्योंकि जिसके प्रति अपराध होता है वो ही हीनभावना से ग्रसित होकर जीवन भर उसका भुक्तभोगी बना रहता है ।

गुरूकुल पद्यति की बात आज के दौर में लगभग अप्रासंगिक है और उस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं दूँगा ।

अन्त में एक बार फ़िर कहूँगा कि सेक्स के बारे में जानकारी और यौन शिक्षा में थोडा फ़र्क है ।

  Tara Chandra Gupta

12 March, 2008 19:05

bahut sahi bhai.,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,