Showing posts with label अनुगूँज. Show all posts
Showing posts with label अनुगूँज. Show all posts

Nov 14, 2007

अनुगूँज को लेकर बातें खत्‍म नही हुई हैं

अनुगूँज को लेकर मेरी पिछली पोस्‍ट ने एक बार फिर से चिट्ठाकारों के मध्‍य उत्‍पन्‍न खाई को दर्शाती है। इसमें मै किसी व्‍यक्ति विशेष को दोष नही दूँगा। अनुगूँज के सम्‍बन्‍ध में उठाये गये प्रश्‍न वास्‍तव में कई प्रश्‍न ले कर आते है। अनुगूँज में मतभेद को लेकर कई वरिष्‍ठ चिट्ठाकारों ने भी अपनी चिन्ता जाहिर किया है। मुझे रोष इसलिय भी था कि मेरी प्रथम भागीदारी में मुझे नकारा गया। मै किसी के प्रथम को बहुत महत्‍व देता हूँ। किसी के असफल प्रथम प्रयास को भी अगर प्रोत्‍साहित किया जाये तो निश्चित रूप आगे आने वाले परिणाम सदैव सार्थक होगें।

अनूगूँज सम्‍बन्‍धी पोस्‍ट पर मैने एक साथ कई बाते रख दी जो वास्‍तव में कई बातों को सामने लेकर आई है। आज जो प्रश्‍न है कि क्‍या एक ब्‍लागर दूसरे की सफलता से खुश है तो मेरा मानना है कतई नही, आज एक ब्‍लागर दूसरे के विचारों को इतना द्वन्‍द ले रहा है कि वह आपसी सौहार्द को भूल जाता है। तभी कभी कभी ऐसी अभद्र टिप्‍पणी देखने को मिलती है अनैतिक होती है। अनैतिक काम भी करना ठीक है किन्‍तु नैतिकता का जामा पहन कर मन में राम बगल में छूरी की धारणा गलत है। अक्‍सर देखने में आता है कि ब्‍लागों पर बहुत ही अभद्र अभद्र टिप्‍पणी आ जाती है जो यह दर्शाता है कि हॉं आज के दौर मे ऐसे लुच्‍्चों की कमी नही है।

कुछ वरिष्‍ठ चिट्ठाकारों ने टिप्‍पणी के माध्‍यम से प्रश्‍न किये थे उनका उत्‍तर भी देना चाहूँगा।

 

आपने कहा मैने कहा

arvind mishra said...

anugoonj bhalaa kya hai ?kya yah koi saahityik abhiyaan hai ?

मित्र आप इसे साहित्यिक अभियान का नाम भी दे सकते है, इसका आयोजन समय समय पर, किसी एक ब्‍लागर द्वारा किया जाता है जो अपनी विषय निर्धारित करता है सभी अन्‍य ब्‍लागर बन्‍धु उस पर लेख्‍ लिखते है, आप भी चाहे तो इस बार के अनुगूँज में भाग ले सकते है।

मै अनुगूँज का महत्‍व भारतीय क्रिकेट की टीम की कैप तरह मानता हूँ, जिसे हर खिलाड़ी पहनने की इच्‍छा रखता है, ठीक उसी प्रकार अनुगूँज में भाग लेने के सम्‍बन्‍ध में मेरे विचार है।

Shiv Kumar Mishra said...

प्रमेन्द्र जी,
आपका कहना एक दम ठीक है. वैचारिक मतभेद कभी भी एक दूसरे को इज्जत देने में आड़े नहीं आना चाहिए. आपका नया ब्लॉग बहुत ही बढ़िया लगा मुझे. उसमें जिस तरह से विभिन्न विषयों पर लिखा जाता है, वो वाकई में तारीफ के काबिल है.
रही बात लिंक देने या नहीं देने की, तो ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं है. आप अच्छा लिखते हैं और इतने सारे विषयों पर लिखते हैं कि आपके पाठक बहुत हैं. अनुगूंज में शामिल न होइए लेकिन अपनी लेखनी चलाते रहिये क्योंकि आपके लेखों का इंतजार बहुत लोगों को रहता है.

श्री शिव कुमार मिश्र जी

मैने अपने चिट्ठाकारी के जीवन में बहुत विवादों को झेला है और कईयों से अपने विभिन्‍न व्‍यवहारों के कारण विवादों का सामना भी किया किन्‍तु कभी किसी को अपशब्‍द नही कहा, किसी को सम्‍मान देने में कमी नही किया। मुझे जानकर अच्‍छा लगा कि आपको मेरा लिखा अच्‍छा लगता है,इससे बड़ी सम्‍मान की बात मेंरे लिये क्‍या होगी। लिंक दिया जाना उतना महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न नही है जिनता लिंकों को हटाया जाना है।

Sunil Deepak said...

परमेंद्र जी, इतना गुस्सा वह भी टिप्पणी न मिलने का? टिप्पणी न होने का यह अर्थ नहीं कि किसी ने पढ़ा नहीं. कभी कभी आलस के मारे में टिप्पणी न लिख पाते पर इसमें गुस्से से अपना खून जलाना ठीक नहीं. :-)

श्री सुनील दीपक जी,

क्षमा चाहूँगा , आपने पोस्‍ट पढ़ने में भूल की है। मेरा क्षोभ टिप्‍पणी को लेकर नही है। पाठक का आना टिप्‍पणी पाने से ज्‍यादा सार्थक होता है। एक सार्थक टिप्‍पणी पूरे लेख को धन्‍य कर देती है।

काकेश said...

आपकी बात से सहमत हूँ. मैने पहले भी इस तरह की गुटबाजी के प्रति लिखा था. आप तो बस लिखते रहिये.धीरे धीरे टिप्पणीयां भी बढ़ जायेंगी.

श्री काकेश जी,

मै जून 2006 से इस चिट्ठाकारिता का कीड़ा मुझमें रेंग रहा है। और शायद मै आपसे पहले से इस कार्य को कर रहा हूँ किन्‍तु इस ढेढ़ साल में मैने यही पाया कि कुछ लोगों में में तो परस्‍पर प्रेम भावना है और एक दूसरे के मदत को अग्रसर रहते है किन्‍तु कुछ ऐसे भी है जो आपना काम तो साधते है किन्‍तु दूसरे का न सधे यह प्रयासरत रहते है। गुटबाजी का दौर तो जून 2006 में भी था जब मै नया नया आया था, और आज भी है। आज स्थिति सोवियत रूस और अमेरिका वाली रह गई है, ओर इसमें पीसने का प्रयास उसे किया जा रहा है जो तटस्‍थ है।

Pratik said...

भाई, हर बार भिन्न व्यक्ति अनुगूंज आयोजित करता है। पहले आपकी पोस्ट शामिल नहीं हुई, इसका मतलब यह नहीं है कि आगे भी शामिल नहीं की जाएगी। लोग अलग, सोच अलग।

भाई प्रतीक जी, अगर कोई कार्य सामूहिकता में किया जाय तो उसमें सभी को प्रतिभाग का अवसर दिया जाना चाहिए, अगल अगर व्‍यक्ति पर निर्भर करता है कि किसी को जगह मिले किसी नही तो इसे सामूहिक आयोजन नही मानना चाहिए।

शास्त्री जे सी फिलिप् said...

प्रिय परमेंद्र,
कुछ व्यावहारिक तरीके से सोचो !
1. एक बार में किसी के बारे में कोई राय न बनाओ. कम से कम तीन बार कोशिश करने के बाद ही किसी के विरुद्ध राय बनानी चाहिये. (अनुगूंज से मेरा कोई संबंध नही है अत: यह एक निर्गुट राय है).
2. अपने चिट्ठे पर आपने कई ऐसे चिट्ठों को कडी दी है जो कभी किसी को भी कडी नहीं देते. तो फिर शिकायत क्यो ?
3. सारथी जैसे "निर्गुट" चिट्ठे को आपने एक भी कडी नहीं दी है (कम से कम मुझे तो नहीं दिखा) वर्ना मुखपृष्ट पर ही हम आपके चिट्ठे को सजा देते. ऐसा हम हर उस चिट्ठे के लिये करते हैं जो हमे कडी देता है -- शास्त्री
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
इस काम के लिये मेरा और आपका योगदान कितना है?

श्री शास्‍त्री जी,

1. यह किसी से व्‍यक्तिगत अक्षेप नही है बल्कि समूहिकता को बढ़ावा देने का प्रयास है, मै तीन बार सोचने की बात पर ध्‍यान दूँगा।

2. अक्‍सर मै जिन चिट्ठों पर जाना होता है या बिल्‍कुल नये है उन्‍ही को मैने अभी तक जगह दी है, चूकिं मेरा लेखन ज्‍यादा लिंक करने वाला नही है, और जहॉं कि मै किसी व्‍यक्ति को लिंक करने वाला लेखन करता भी हूँ तो शीध्र उपलब्‍ध होने वाले लिंक को जगह दे देता हूँ। साथ ही साथ अगर भूल भी जाता हूँ तो किसी के याद दिलाने अथवा लिंक दिये जाने पर तुरंत डाल देता हूँ।

3. चूंकिं मैने पहले भी कहा है कि मेरा लेखक लेख में लिं‍किंत करने वाला नही है। न ही कभी आपके बारे में लिखने का मौका मिला न ही आप लिंक हुऐ। और बात रही साईड में लिंक देने की मै सदैव तत्‍पर हूँ, सभी के लिंक देने के लिये, बशर्ते वह मेरा भी लिंक जरूर दे। जो मेरा लिंक नही भी देगें मै उन्‍हे एक माह तक जरूर अपने ब्‍लाग पर जगह दूँगा। जिन दिन भी मैने लिंक डालूँगा आप अपने जो भी लिंक हो भेज दीजिऐ मै दे दूँगा।

Gyandutt Pandey said...

ऐसा है तो आपके साथ निश्चित गलत हुआ। मुझे आपसे सहानुभूति है।

श्री ज्ञान दत्‍त पाडेय जी, आपका हार्दिक धन्‍यवाद, जरूरत है गलत व्‍यवस्‍था के खिलाफ आवाज उठाने की।

और जहॉं तक मुझे याद है कि आपने एक लेख में अभद्र टिप्‍पणी के सम्‍बन्‍ध में लिखा था। और मेरी समस्‍या को लिंक किया था। आपने अभद्र टिप्‍पणी से पीडि़त होकर ही ब्‍लाग को मडरेट मोड में डाला था।

Sagar Chand Nahar said...

ऐसा नहीं चलेगा.. जिस दिन हम अनूंगूंज आयोजित करेंगे उस दिन आपको लिखना ही पड़ेग यह हमारा आदेश है। समझे... :)
(स्माईली लगा दी है )
अब मुस्करा भी दो भाई।

श्री सागर भाई, मेरा बहिष्‍कार सिर्फ वर्तमान अनूगूँज के लिये है, वह भी केवल विरोध स्‍वरूप जब आप आयोजन करेगें तो मै जरूर शामिल होऊँगा। :) अगर आपका विषय गांधी जी होगा तो मजा आयेगा :D

Sanjeet Tripathi said...

बंधु, यदि पक्षपात हो रहा है, और आपकी टिप्पणियां वहां से हटाई जा रही है तो यह तो गलत बात है!!

श्री संजीत भाई, मैने वहॉं टिप्‍पणी की थी अब चाहे वह किस प्रकार हटी मै नही जानता किन्‍तु इनता जरूर था कि मेरी टिप्‍पणी वहॉं थी।

कल मेरे इस शिकायती लेख के बाद श्री आलोक जी जो कि उस अनुगूँज के आयोजक थे, उन्‍होने खेद प्रकट किया और अपने खेद पत्र का सार्व‍जनिक करने को भी कहा, उनके इस पत्र में मेरा हृदय भी काफी दुखित हुआ, किन्‍तु मै सामूहिकता में किसी एक को दोष नही दूँगा। श्री आलोक जी आयोजक मात्र थे और अयोजक की कोई गलती नही है, क्‍योकि आयोजक की अपनी सीमाएं है। श्री आलोक जी के प्रति मेरे हृदय में सम्‍मान है और सदा रहेगा। मेरे इस विरोध को किसी के द्वारा व्‍यक्तिगत नही लिखा जाना चाहिए। बस उद्देश्‍य इतना ही है कि सामूहिकता में षयन्‍त्र की कोई जगह न हो। मेरे इस लेख से कई नई बाते सामने आई है और कई मित्र इससे सीख लेकर किसी प्रतिद्वन्दिता में शामिल न होकर, सामूहिकता और सहयोग को बढ़ावा देगें। अभी बातें खत्‍म नही हुई और निश्चित रूप से गलत काम के खिलाफ बात खत्‍म नही होनी चाहिए।

Nov 13, 2007

मै अनूगूँज का बहिष्‍कार करता हूँ

पिछली बार 15 अगस्‍त को आयोजित अनुगूँज मैने एक लेख लिखा था तथा अनुगूँज से सम्‍बन्धित पोस्‍ट पर कई टिप्‍पणी भी किया था किन्‍तु आज के दिन न किसी पोस्‍ट पर मेरी टिप्‍पणी ही है और न ही मेरी पोस्‍ट को अनुगूँज में शामिल ही किया गया। यह मेरा अनुगूँज में पहला प्रयास था और हर चिट्ठाकार की इच्‍छा होती है कि वह भी इसका अंग बने इसीलिये मैने काफी उत्‍सुक होकर इसमें भाग भी लिया था किन्तु पिछले कटु अनुभवों से लगता है कि अबकी बार अनुगूँज में भाग लेना ठीक नही है।

निश्चित रूप से मेरी पोस्‍ट को या तो अनुगूँज के लायक नही समझा गया या तो कोई कारण रहा हो इसके विषय में मै नही जानता हूँ। किन्‍तु मेरा धारणा है कि जहॉं सम्‍मान न हो वहॉं रहना ठीक नही है। कनिष्‍ट जरूर हूँ तिरष्‍कृत नही हूँ। आज कल हिन्‍दी ब्‍लागिंग में खाई बढ़ती ही जा रही है। आज भी गुट बाजी का दौर बरकरार है। और अपने पराय का भेदभाव बरकरार है।

सच कहूँ तो आज गुटबाजी अपने चरम पर है और इसी गुटबाजी का ही परिणाम है कि लोग अपनी वैचारिक दूरी को अपनी व्‍यवहारिक जिन्‍दगी मे उतार लेते है। आज हिन्‍दी चिट्ठाकारिता में कुछ मठाधीशों मठाधीशी और कुछ सक्रिय चटुकाओं की चटुकारिता का परिणाम है कि आज हिन्‍दी ब्‍लाग में यह वैमनस्‍य आ गया है। मठाधीशी मै इस लिये कह रहा हूँ कि कुछ लोग आज भी अपने आपके हिन्‍दी ब्‍लागिंग के स्‍वयंभू मनवाने में लगे हुऐ है और कुछ लोग तो उनकी चटुकारिता करके अपने अस्तिव को बचाये रखने की जद्दोजहद में लगे है। यही कारण है कि कुछ ब्‍लागर सिर्फ कुछ ब्‍लागों तक ही कूपमंडूप दिखते है। उनकी सीमाएं सिर्फ आपस मे ही लै टिप्‍पणी दै टिप्‍पणी तक ही होती है।

अनुगूँज के बहाने आज काफी कुछ मुँह से निकल गया है,किन्‍तु जो कुछ भी निकला है गलत नही है, आज मेरे किसी भी ब्‍लाग का लिंक शायद ही किसी के बलाग पर हो। किन्‍तु मेरे बर्तमान दो सक्रिय ब्‍लाग पर इस समय दो दर्जन से ज्‍यादा लिंक मौजूद है। मुझे आश्‍चर्य तो तब हुआ कि जब मेरी टेक्नोराटी रेटिंग 54 से घट कर 44 पर आज जाती है। अर्थात आज भी ऐसे तत्‍व मौजूद है जो लिंक हटाने के काम में लगे है। मेरे उपर इन बातों का कोई असर नही होने वाला है मेरे ब्‍लाग पर जो भी अपना लिंक डालने को कहता है मै सहर्ष डालने को तैयार हूँ, मुझे कोई आपत्ति नही है। किन्‍तु वह ब्‍लाग सभ्‍य हो।

मै लिखता हूँ तो सिर्फ आपने पाठको के लिये न किसी व्‍यक्ति विशेष की टिप्‍पणी के लिए, न ही मै किसी की टिप्‍पणी का भूखा हूँ न कि किसी वाह वाह या अति सुन्‍दर शब्‍द सुनने के लिये। मै सप्‍ताहिक लगभग 55 टिप्‍पणी कर पाता हूँ जो पोस्‍ट अच्‍छी लगती है उसी पर करता हॅूं, नही तो जाकर वापस भी आ जाता हूँ। यही कारण है कि किसी किसी की 6-7 माह पुरानी पोस्‍ट पर भी टिप्‍प्‍णी हो जाती है।

जहॉं तक अनुगूँज की घोषणा हो गई है और मै अनुगूँज की बहिष्‍कार करता हूँ, क्‍योकि मै किसी कि मठाधीशी और चाटुकारिता नही करूँगा। भाड़ में जाये अनुगूँज और भा़ड मे जाये मठाधीशी, आज 4 माह बाद अपने लेख को अनुगूँज पर न देखकर निश्चित रूप से दुख तो हुआ ही है। अब मै दोबारा अवसर नही दूँगा।

Aug 5, 2007

अनुगूँज - ये बाते तब पर भी न बदलेगीं।

Akshargram Anugunj

हिन्‍दुस्‍तान अमेरिका बन जायेगा तो कोई बड़ी बात न होगी क्‍योकि दिन प्रतिदिन भारत अमेरिकी नक्‍शेकदम पर चल ही रहा है। नारी से लेकर खिलाड़ी तक सभी अमेंरिकी रंग में रगते दिख रहें। जहॉं नारी 8 गज की साड़ी चाहती थी वही 2 गज मे ही उसका काम चल जाता है और फिर कहती है कि मुझे अंग प्रदर्शन से परहेज नही है, जब देने वाले ने दिया है तो दिखाऊँ क्‍यो न? अर्थात कुछ स्‍त्री जाति का मानना है कि ईश्‍वर ने उन्‍हे अंग-प्रदर्शन के लिये है। यह वाहियात सोच अमेरिकी ही हो सकती है जबकि भारतीय मानस की सोच तो यह कि ईश्‍वर ने अगर अंग दिया है जो उसे ढ़कने के लिये वस्‍त्र भी।
जितने मुँह उतनी बातें इसलिये मूल विषय पर आना जरूरी है। भारत चाहे अमेरिका बन जाये या बन जाये इराक-ईरान किन्‍तु कुछ बातें सदैव अपरिवर्तित रहेगीं। मै उन्‍ही पर चर्चा करना पंसद करूँगा।
1. अगर हिन्‍दोस्‍तान अमेरिका बन जायेगा तो भी हिन्‍दोस्‍तान हिस्‍दोस्‍तान ही रहेगा। कारण साफ है कि कुत्‍ते की दुम कितनी भी सीधी की जाये वो सीधी होने वाली नही है।
2. सबसे बड़ी समस्‍या आयेगी कि नेताओं का क्‍या होगा और उनकी मक्‍कारी का ? क्‍योंकि यह जाति हमारें देश में काफी तेजी से बड़ रही है तब पर भी आराक्षण की मॉंग की जा रही है। भारत के अमेरिकामय हो जाने पर नेताओं की नीयत में बदलाव कम ही सम्‍भव है या कह सकते है कि असम्‍भव है।
3. शिक्षा में आराक्षण भी अपरिवर्तित रहेगा। जब भारत परतन्‍त्र से स्‍वतंत्र हुआ तब से लेकर आराक्षण सेठ के ब्‍याज की भातिं बढ़ता जा रहा है। भारत में आराक्षण इसलिये लागू किया गया कि सभी को समानता दिलाई जायेगी। किन्‍तु समानता दिलाने के नाम पर एक अच्‍छे तथा परिश्रमी वर्ग को ठगा जा रहा है। जहॉं एक विद्यार्थी 121 अंक प्राप्‍त करके भी उच्‍च शिक्षा के वचिंत रह जाता है वही एक छात्र जो 50 से लेकर -50 अंक पाने पर भी उच्‍च शिक्षा ग्रहण करने का पात्र होता है। यह एक प्रकार से हास्‍यस्‍पद होगा कि भारत के तत्कालीन उपराष्‍ट्रपति की पुत्री भी आराक्षण का लाभ लेती है। वोटों के खेल के नाम पर आराक्षण रूपी गेंद को तब तक लात मारा जायेगा जब तक कि क्रान्ति का उद्गार न होगा।
4. भारत आज सबसे बड़ा लोकतंत्र है और अमेरिका दूसरा, किन्‍तु हम आज भी अमेरिका जैसा बनने की कोशिस कर रहे है। हमारे देश में के नागरिक अपने अधिकार के बारे में तो जानते है कि कर्तव्‍य से अ‍नभिज्ञ रहते है। भारत को अमेरिका बनने के बाद भी यह कायम रहेगा।
5. हम भारत में रह कर भारत को अमेरिका बनाने की धारणा भी भारतीयों में बरकरार रहेगी। यह शर्म की बात है, जहॉं हमें सूरज बनकर पूरे विश्‍व को रोशनी दिया है वही हम सूरज को दिया दिखाने अर्थात भारत को अमेरिका बनने की बात कर रहे है। यह भी मानसिकता भारतीयों में नही बदलेगी।

अनुगूँज में पहली बार भाग ले रहा हूँ, हो सकता है कि नियमों या अन्‍य बातों के बारे में जानकारी न हो। इसके लिये भूल गलती को माफ करेगें।

प्रश्‍न

भारत के प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार की न्‍यूनतम आयु कितनी है ?

भारत के प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार की न्‍यूनतम आयु कितनी है ?