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Mar 18, 2008

सुभाषित

दातव्‍यमिति यद्दानं दीयतेSनुपकारिणे।

देश काले च पात्रे च तद्दानं सात्विक स्‍मृतम्।।  श्री म.भ.गीता 17/20

भावार्थ -

दान देना ही कर्त्तव्‍य है, ऐसे भाव से जो दान देश तथा काल और पात्र के प्राप्‍त होने पर अउपकार न करने वाले के प्रति दिया जाता है, वह दान सा‍त्विक कहा गया है।

शुभाषित, अमृत वचन

Aug 4, 2007

स्वामी विवेकानंद ने कहा है-----

"पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता और एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान।' ध्यान के द्वारा ही हम इंद्रियों पर संयम रख सकते हैं। शम, दम और तितिक्षा अर्थात मन को रोकना, इन्द्रियों को रोकने का बल, कष्ट सहने की शक्ति और चित्त की शुद्धि तथा एकाग्रता को बनाए रखने में ध्यान बहुत सहायक होता है।"


Aug 3, 2007

अमृत वचन - Amrit Vachan

"यह देश, धर्म, दर्शन और प्रेम की जन्मभूमि है। ये सब चीजें अभी
भी भारत में विद्यमान है। मुझे इस दुनिया की जो जानकारी है, उसके बलपर
द्रुढतापूर्वक कह सक्त हूं कि इन बातों में भारत अन्य देशों की अपेक्षा अब भी
श्रेष्ठ है।"

- स्वामी विवेकानंद

"दूसरों से सहायता की आशा करना या भीख मांगना किसी दर्बलता का चिन्ह है। इसलिये बंधूओं निर्भयाता के साथ यह घोषणा करो की हिंदूस्तान हिंदूओं का ही है। अपने मन की दूर्बलता को बिल्कुल दूर भगा दो।"

- डा. हेडगेवार

प्रश्‍न

भारत के प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार की न्‍यूनतम आयु कितनी है ?

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