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Jul 15, 2008

हँसों जम के हँसो

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1

वैलेंनटाईन डे के दिन एक प्रेमी जोड़ा एक बाग में मिलता है, प्रेमी जोड़ा पेड़ के तले बैठ जाता है. प्रेमिका की तारीफ करते हुए प्रेमी बोलता है, तुम्हारी आँखें बहुत प्यारी हैं, इनमें डूबने को मन करता है, इन आँखों में मुझे सारी दुनिया नजर आती है।
इतने में पेड़ से आवाज आती है, रे भाई कल शाम से मेरा गधा गुम है, हो सके तो देख बताओ ना कहां है।

 

2

बॉस गुस्से में कर्मचारी से बोला, तुमने कभी उल्लू देखा है।

कर्मचारी ने सिर झुकाते हुए कहा, नहीं सर।

बॉस ने जोर से डांटा, नीचे क्या देख रहे हो, मेरी तरफ देखो।

 

3

बॉस गुस्से में कर्मचारी से बोला, तुमने कभी उल्लू देखा है।

कर्मचारी ने सिर झुकाते हुए कहा, नहीं सर।

बॉस ने जोर से डांटा, नीचे क्या देख रहे हो, मेरी तरफ देखो।

 

4

संता बुदबुदाते हुए समाजशास्त्र के प्रश्न पत्र को हल कर रहा था, भारत में हर तीन मिनट बाद एक औरत एक बच्चे को जन्म देती है। आने वाली भयावह स्थिति पर किस प्रकार नियंत्रण पाया जा सकता है?

बंता पीछे से कहता है, पहले उस औरत को तलाश करना चाहिए।

 

5

शिक्षक (छात्र से) - बताओ फोर्ड क्या है?

छात्र (शिक्षक से) - गाड़ी।

शिक्षक - वेरी गुड, अब बताओ आक्सफोर्ड क्या है?

छात्र - बैल गाड़ी।

Jul 4, 2008

चिट्ठाकारी में महाशक्ति के दो साल

बीते माह की 30 तारीख को हमारे चिट्ठाकारी जीवन 2 साल पूरे हो गये, और देखिए, मै यहीं बात भूल गया कि 30 जून को मैने अपना ब्‍लाग बनाया था। खैर देर आये दुरूस्‍त आये की तर्ज पर हम दुरूस्‍त आ गये है, और अपने चिट्ठाकारी के तीसरे साल में पहुँच कर 2 साल पूरे करने की घोषणा करते है।

 

हुआ यो कि मै अपने पढ़ाई लिखाई, खेल कूद जैसे विषयों पर छुट्टी में ज्‍यादा व्‍यस्‍त था। और इन दिनों मुझे याद ही नही रहा कि मै कभी चिट्ठाकार भी हुआ करता था। :) आज अचानक गाहे बगाहे ही याद आ गया कि मेरे चिट्ठाकारी शुरू किये दो साल पूरे हो गये है। थोड़ा दुख भी हुआ कि उस दिन पोस्‍ट न डाल सका, क्‍योकि खास दिन की पोस्‍ट का कुछ खास ही महत्‍व होता है।

 

इधर चिट्ठाकारी और कम्‍प्‍यूटर से दूरी का मुझे सकारात्‍मक परिणाम देखने को भी मिला, 2006 के ग्रेजुएशन में मेरा अब तक का सबसे खराब शैक्षिक प्रदर्शन हुआ था, और मै मात्र 0.42 प्रतिशत अंक की कमी के कारण 50 प्रतिशत अंक भी नही पा पाया था, मुझे इसकी कसक आज तक  है। कई ऐसी परीक्षाये आयोजित होती है जिसमें 50 प्रतिशत की मॉंग होती है और मै अयोग्‍य हो जाता हूँ और दिल पर सिर्फ और सिर्फ खीझ और सिर्फ निराशा ही हाथ आती है।

 

चूकिं मेरी इच्‍छा विधि की पढ़ाई की थी और 2006 की असफलता के ग्रहण के कारण इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में प्रवेश न हो सका था। इच्‍छा के विपरीत साल न खराब हो इस लिये राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय से एम ए का फार्म भर दिया था और फिर इस बार मैने पक्‍का इरादा किया था कि परास्‍नातक में अच्‍छा प्रर्दशन करूँगा। और इसी विश्वास के कारण अर्थशास्त्र परास्‍नातक में प्रथम सेमेस्‍टर में 58, द्वितीय में 65 तथा हफ्ते भर पूर्व घोषित तृतीय सेमेस्‍टर में 76 प्रतिशत अंक लाये थे। यह मेरी अब तक की दी गई किसी भी परीक्षा का सर्वोत्‍तम अंक है। निश्चित रूप से आशा के अनुरूप सफलता पर खुशी मिलती है।

2007 के शुरू होते ही विधि की पढ़ाई की प्रबल इच्‍छा फिर जाग गई, और असमजस में था कि एमए के साथ विधि कैसे होगा, किन्‍तु कुछ मित्रों ने बताया कि मुक्त विश्वविद्यालय की पढ़ाई के साथ किसी और विश्वविद्यालय से डिग्री कोर्श कर सकते है, मुक्त विश्वविद्यालय के गुरूजनों से सम्‍पर्क किया तो उन्होने भी ऐसा ही उत्तर दिया। अक्‍टूबर माह में मैने विधि में प्रवेश ले लिया और कम समय में पर्याप्‍त तैयारी के बोझ के साथ लग गया। फरवरी में एमए तीसरे सेमेस्‍टर की परीक्षा के बाद ही 15 अप्रेल से विधि के पर्चे भी प्रारम्‍भ हो गये। मेरी बहुत अच्‍छी तैयारी नही थी, किन्‍तु जहां चाह तहाँ राह की धारण सत्‍य हुई 2 जुलाई को मेरा विधि का परिणाम हुआ, रिजल्‍ट आशा के‍ विवरीत हुआ, करीब 60 से 65 प्रतिशत की उम्‍मीद लगा कर बैठा था किन्‍तु 56 प्रतिशत पर आ कर रूक गया, तो भी परिणाम ठीक ही रहा। 7 और 9 जुलाई को मेरा एमए का अन्तिम सेमेस्‍टर होगा, और इस साल मेरे पास काफी समय होगा विधि के लिये और पूरी कोशिश करूँगा कि अगली परीक्षाऍं भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करूँ।

 

पिछले तीस जून 2007  का लेख - चिट्ठाकारी में महाशक्ति के एक साल

Jun 3, 2008

अब हम न भए

अब हम न भए तो क्‍या हुआ दुनिया का चलना काम है। मेरे रूकने से दुनिया नही रूकेगी, मै अपना काम करूँगा और दुनिया अपना, यही प्रकृति के नियमानुसार कार्य होता रहेगा। आज मुझे कोई लेख लिखे करीब 15 दिन के आस पास हो रहा है, यह कम्‍प्‍यूटर के नजदीक होने के बाद भी इतना बड़ा गैप पहली बार हो रहा है।

 

किसी भी एग्रीगेटर पर गये भी करीब हफ्ते भर से ज्‍यादा समय हो रहा है, एक दो टिप्‍पणी अपने चहेते ब्‍लागों पर हुई वह एक अपवाद हो सकता है। पिछले कुछ महों से हिन्‍दी ब्‍लाग जगत में अभूतपूर्व बदलाव के माहोल देखने को मिला, कि आज के व्‍यक्ति को ओछी हरकत करने के लिये कोई भी जगह नही है, शायद यही कारण है कि आज हिन्‍दी ब्‍लाग में भी स्‍तरीय गिरवट देखने को मिल रहा है।

 

जहॉं अच्‍छा माहोल व व्‍यवहार होता है वहॉं लिखने बैठने का मन करता है किन्‍तु मन कहता है कि हिन्‍दी ब्‍लागिंग में कि अब  हम न भए। .... लिखने की इच्‍छा थी किन्‍तु आवाश्‍यक काम आ गया, समय मिला तो फिर लिखेगे :)

May 14, 2008

ट्रक की टक्कर और ईश्‍वर की कृपा

कल दिन में एक फार्म के चक्‍कर में काफी घूमना हुआ, दोपहर की घूप कुछ ज्‍यादा की दुखदाई थी। करीब लौट कर आने में 2 बज गये थे। तबियत ठीक नही लग रही थी। लग रहा था कि काफी तेज बुखार है, और था भी। रात्रि में करीब 10.30 बजे सोता हूँ किन्‍तु कल 8 बजे ही सो गया था।

 

सुबह की क्रिकेट मंडली अपने समय पर आ गई थी और मै भी रोज की तरह सबसे पहले चाय पीकर तैयार था। इच्‍छा तो नही कर रही थी आज जाने को क्‍योकि तबीयत कुछ ठीक नही थी, किन्‍तु अगर एक दिन का गैप हो जाता है तो पूरा दिन शरीर दर्द करता है।

 

हमारा मैच करीब 6 बजे शुरू हो गया था। मेरी टीम की बालिंग थी, तीन ओवर हो चुके थे चौथे ओवर की 3 गेंद फेक की रहा था कि आचनक लव कुमार गुप्‍ता आ गया। वह काफी हडबड़ी में था, मैने पूछा क्‍या हुआ ? उनसे कहा कि पिता जी को ट्रक ने टक्‍कर मार दिया है। मेरे पैर से जमीन ही खिसक चुकी थी। उसने कहा कि तुरंत चलो, पिताजी को मदनानी से वात्‍सल्य ले जाना होगा। मैने जल्‍दबाजी में अपना ओवर पूरा करके वहॉं से निकल दिया।

 

मदानानी में लव के पिताजी को देखा तो वे काफी ठीक थे, जितनी बड़ी र्दुघटना थी, छति काफी कम थी, मुझे यहीं पर ईश्‍वर का न्‍याय समझ में आया, कि क्‍यो‍ लोग इस पत्‍थर वाले को पूजते है। पिताजी के दाये हाथ ओर पैर में भंयकर चोटें आई थी, सफेद हड्डी तक दिख रही थी। ईश्‍वर का प्रभाव था कि करीब 58 साल की उम्र में हड्डी आदि पर कोई प्रभाव नही पड़ा।  लव के कहने पर मैने गाड़ी निकाली और तुरंत लव के पिताजी को बैठाकर वातसल्‍य की ओर निकल दिया। और उन्हे अस्पताल में भर्ती करवा दिया।

 

लव के पिताजी अपने दोनो पैरों पर चल रहे थे और काफी अच्‍छा महसूस कर रहे थे, किन्‍तु दर्द का एहसास तो था ही। उन्‍होने बताया कि घटना चौफटका के पुल के पास वाले पेट्रोल पम्‍प के पास की है। एक ट्रक वाला काफी तेजी से आ रहा था कि आचानक टक्‍कर पार दी। मै तो किसी तरह कूद गया किन्‍त साइकित वही दोना हो गई। ट्रक जा कर खम्‍बे से टकरा गई और खम्‍भा टूट गया। ट्रक वाला भाग गया।

 

जो कुछ सुबह सुबह घटित हुआ बहुत ही दुखद: था किन्‍तु ईश्‍वर को धन्‍यवाद देता हूँ कि वह बहुत बड़ा रखवाला था।

May 13, 2008

बारिस की पहली बूँद और हमारा क्रिकेट मैच

आज रात करीब 1 बजे सोया ओर 4 बजे जग गया। काफी अच्‍छा लग रहा था। कि सुबह 5.15 पर इलाहाबाद में बारिस की बूँदों ने दस्‍तक दे दिया। मौसम ठंड़ा और सुहावना होगा गया है। इस पानी का हमारे क्रिकेट मैच पर कोई असर नही पड़ेगा। हम बसते पानी में भी बहुत अच्‍छी क्रिकेट खेलते है। :)  क्रिकेट ही नही अगर मैदान में ज्‍यादा पानी भर जाता है तो हम क्रिकेट की बाल से फुटबाल भी खेल लेते है।

 

अब चलता हूँ परीक्षा बहुत हद तक समाप्‍त हो गई है, सम्‍पर्क में बना रहने की कोशिश रहेगी। कुछ हद तक इस लिये क्योंकि अन्तिम तिथि तो समाप्‍त होने की 12 थी किन्‍तु 5 को विधान परिषद के चुनाव के कारण पेपर स्‍थगित हो गया था, अब वह पेपर 22 को है।

शेष शुभ

जय श्रीराम

Apr 3, 2008

हिन्‍दू विवाह

 

 

हिन्‍दू विवाह एक संस्‍कार हुआ करता था किन्‍तु भारत सरकार के द्वारा हिन्‍दू‍ विवाह अधिनियम, 1955 के अनुसार अब न यह संस्‍कार है और न ही संविदा। अपितु यह दोनो का समन्‍वय हो गया है। भारत सरकार के इस अधिनियम से निश्चित रूप से हिन्‍दू भावाओं को आधात पहुँचा है क्‍योकि यह हिन्‍दू धर्म की मूल भावानाओं का अतिक्रमण करता है तथा संविधान की मूल भावनाओं का उल्‍लंघन करता है।

हिन्‍दू विवाह जहॉ जन्‍मजन्‍मान्‍तर का संबध माना जाता था इसे एक खेल का रूप दे दिया गया है तथा हिन्‍दुओं की प्रचीन पद्धति को न्‍यायालय को मुहाने पर खड़ा कर दिया गया, जिसे परमात्‍मा भी भेद नही सकते थे। महाभारत में स्‍त्री पुरूष का अर्ध भाग है तथा पुरूष बिना स्‍त्री के पूर्णत: प्राप्‍त नही कर सकता है। धर्म के लिये पुरूष तथा उपयोगी होता है जबकि उसके साथ उसकी धर्म प‍त्‍नी साथ हो, अन्‍यथा पुरूष कितना भी शक्तिशाली क्‍यो न हो वह धर्मिक आयोजनों का पात्र नही हो सकता है।

रामायण में भगवान राम भी सीता आभाव में धर्मिक आयोजन के योग्‍य नही हु‍ऐ थे। रामायण कहती है कि पत्नी को पति की आत्‍मा का स्‍वरूप माना गया है। पति अपनी पत्नि भरणपोषण कर्ता तथा रक्षक है।

हिन्दू विवाह एक ऐसा बंधन है जिसमें जो शरीर एकनिष्‍ठ हो जाते है, किन्‍तु वर्तमान कानून हिन्‍दू विवाह की ऐसी तैसी कर दिया है। हिन्‍दू विवाह को संस्‍कार से ज्‍यादा संविदात्‍मक रूप प्रदान कर दिया है जो हिन्‍दू विवाह के स्‍वरूप को नष्‍ट करता है। हिन्‍दू विवाह में कन्‍यादान पिता के रूप में दिया गया सर्वोच्‍च दान होता है इसके जैसा कोई अन्‍य दान नही है।

विवाह के पुश्‍चात एक युवक और एक युवती अपना वर्तमान अस्तित्‍व को छोड़कर नर और नारी को ग्रहण करते है। हिन्‍दू विवाह एक बंधन है न की अनुबंध, विवाह वह पारलौकिक गांठ है जो जीवन ही नही मृत्‍यु पर्यन्‍त ईश्‍वर भी नही मिटा सकता है किन्‍तु भारत के कुछ बुद्धि जीवियों ने  हिन्‍दू विवाह की रेड़ मार कर रख दी है इसको जितना पतित कर सकते थे करने की कोशिश की है। भगवान मनु कहते है कि पति और पत्नि का मिलन जीवन का नही अपितु मृत्‍यु के पश्चात अन्‍य जन्‍मों में भी य सम्‍बन्‍ध बरकरार रहता है। हिन्‍दू विवाह पद्धिति में तलाक और Divorce शब्‍द का उल्‍लेख नही मिलता है जहॉं तक विवाह विच्‍छेन का सम्‍बन्‍ध है तो उसे शब्‍द संधि द्वारा बनाया गया। अत: हिन्‍दु विवाह अपने आप में कभी खत्‍म होने वाला सम्‍बन्‍ध नही है।

वयस्‍कता प्राप्‍त करने पर,संतानों को मनमानी करने का फैसला निश्चित रूप से हिन्‍दू ही नही अपितु पूर भरतीय समाज के लिये गलत था। क्‍या मात्र 18 वर्ष की सीमा पार करने पर ही पिछले 18 वर्षो के संबध की तिलाजंली देने के लिये पर्याप्‍त है? है

1914 के गोपाल कृष्‍ण बनाम वैंकटसर में मद्रान उच्‍च न्‍यायाल ने हिन्‍दु विवाह को स्‍पष्‍ट करते हुये कहा कि हिन्‍दू विधि में विवाह को उन दस संस्‍कारों में एक प्रधान संस्‍कार माना गया है जो शरीर को उसके वंशानुगत दोषों से मुक्‍त करता है।

इस प्रकार हम देखेगें तो पायेगें कि हिन्‍दू विवाह का उद्देश्‍य न तो शारीरिक काम वासना को तृप्‍त करना है वरन धार्मिक उद्देश्‍यों की पूर्ति करना है। आज हिन्‍दू विवाह को कुछ अधिनियमों ने संविदात्मक रूप प्रदान कर दिया है तो हिन्‍दू विवाह के उद्देश्‍यों को छति पहुँचाता है।

अभी बातें खत्‍म नही हुई और बहुत कुछ लिखना और कहना बाकी है। समय मिलने पर इस संदर्भ में बाते रखूँगा।

Mar 13, 2008

सत्‍यानाश हो ब्‍लागवाणी का

हिन्‍दी चिट्ठाकारी की मठाधीशी अपने चरम पर है और आज नारद के बाद ब्‍लागवाणी को अपने चपेट में ले रहा है। आये दिन ब्‍लाग वाणी को लेकर विवाद किये जाते है, कि मैथली जी ये कर देना चाहिए, मैथिली जी वो कर देना चाहिऐ। जैसे मैथली जी के पास ब्‍लागवाणी की चौकीदारी के अलावा कोई काम नही है। मैथली जी के अपने कम है, ब्‍लावाणी ही बहुत कुछ है किन्‍तु सब कुछ नही है।  किन्‍तु कुछ लोग आज ऐसे भी जो ब्‍लागवाणी के नाम पर अपने ब्‍लागों की बैतरणी पार कर रहे है। लिखते कुछ नही है ब्‍लागवाणी के नाम की मोहर लगा कर गोल गप्‍पा जैसा मुँह फुला कर चले आते है। तरह तरह की वाहियात बाते ब्‍लागवाणी के नाम के आड़ में होती है।

   

ऊपर जो कुछ भी मैने लिखा है वह वाहियात बातें है क्‍योकि अनर्थ का अर्थ भी आप लोग बना देते है।  आज मै आपसे अपेक्षा करता हूँ कि ब्‍लागवाणी के नाम के जाल में दोबारा नही फँसेगे। :) रचना की रचनात्‍मकता पर जायेगे न कि ब्‍लागवाणी के नाम पर। क्‍योकि ब्‍लागवाणी के नाम पर पोस्‍ट हिट करना मात्र छलावा ही है। जो आज मैने किया है। :)

   

इसी के साथ मेरी महाशक्ति ब्‍लाग पर 200वीं पोस्‍ट भी सम्‍पन्न होती है, जिसे मै ब्‍लागवाणी तथा ब्‍लागवाणी नाम को पढ़कर पोस्‍ट क्लिक और पंसद करने वालों को सर्मपित करता हूँ। कुछ दिनों पूर्व महाशक्ति ब्‍लाग ने अपने 200 पोस्‍ट पूरी की थी। यह महाशक्ति ब्‍लाग की 212वी तथा मेंरी 200वीं पोस्‍ट है।  अंत में एक निवेदन और करूँगा कि अगर आपने अभी तक इस लेख को ब्‍लागवाणी पर पंसद नही किया है तो तुंरत पंसद कर अपने जगरूकता का परिचय दे। :)

   

अन्‍तोगत्‍वा यह एक मजाक था, और इसे आप मेरी 1 अप्रेल की पोस्‍ट भी कह सकते है क्‍योकि मेरा पुन: अवकाश लेने का समय आ गया है, और शायद ही पहली अप्रेल की पोस्‍ट कर पाऊँ :) यह अवकाश अगली परीक्षा 15 अप्रेल से प्रारम्‍भ होने के कारण ले रहा हूँ, 6 मई अथवा गरमी की छुट्टी के बाद पुन: वापसी होगी। इस पुन: मेरे ब्‍लाग को भइया देखेगे और मै भी उपस्थित रहूँगा ताकि कभी हाथ में खुजली हो तो एकाथ पोस्‍ट दाग सकूँ।

   

अन्‍त में गंवैया लहजे में- सत्‍यानाश हो ब्‍लागवाणी का बुरा चाहने वालों के लिये -

ब्‍लागों में कीड़े पडें, सात पोस्‍टों टिप्‍पणी न नसीब हो, उनका कप्‍यूटर हैंग कर जाये, ब्‍लाग पर खूब बेनाम टिप्‍पणी आये, पोस्टिग का बटन न काम करें, पोस्टिंग करते समय बिजली चली जाये, उनके ब्‍लाग पर आने वालों को 404 का चस्‍पा नज़र आये..... और भी आशीष वचन है, कि पोस्‍ट खतम नही होगी। अगर आपके पास कुछ इस तरह के आर्शीवद हो तो जरूर दीजिएगा। :)

   

अस्वीकरण - मजाक में बहुत कुछ गलत कह गया हूँ अत: कृपया अन्यथ न लें :)

Mar 11, 2008

संस्कार शिक्षा या सेक्स एजुकेशन

Sanskar Shiksha or Sex Education

पिछले सेक्‍स शिक्षा पर लेख पर श्री अरूण जी, श्री समीरलाल जी, श्री ज्ञानजी तथा श्री भुवनेश भाई की टिप्‍पणी मिली थी। जहाँ तक मै स्‍पष्‍ट कर दूँ कि सेक्‍स शिक्षा का विरोधी नही हूँ किन्‍तु सेक्‍स शिक्षा के नाम पर अवस्‍यको के प्रतिशिक्षा का विरोधी हूँ। अरूण जी का कहना ठीक है कि स्‍कूलों में सेक्‍स शिक्षा के नाम पर व्‍यापार केन्‍द्र खोलने का प्रयास किया जा रहा है। ज्ञान जी का कहना भी सही है कि यह एक व्‍यापक बहस का मुद्दा है और समीर लाल जी भी उनकी बात से सहमत है किन्‍तु भुव‍नेश भाई को नही लगता कि यह गलत कदम है।

उनका यह सोचना भी अपने जगह पर वाजिब है, उन्‍होने कई प्रश्‍न टिप्‍पणी में छोड़ रखे थे उन पर चर्चा करना जरूरी है मैने प‍िछले लेख में दो शब्‍दों का प्रयोग किया था हया और बेहया उस पर गौर किया जाना जरूरी था अगर उस पर गौर किया जाता तो यह तो काफी प्रश्नों के उत्‍तर मिल जाते किन्‍तु लगता है कि विश्लेषण करना जरूरी है। हम सभी उस दौर से गुजर चुके है मै भी शायद आप भी, किन्तु अपनी ज्ञान वृद्धि का कभी प्रदर्शन करने की सोच नही रखी कि जो पड़ा या देखा है उसका प्रयोगिक कार्य भी किया जाना चाहिऐ। इसी को शायद हया कहते है, कि हम अपने में विचार करने की क्षमता विकसित करते है। मस्‍तराम के किस्‍से तो मैने अपने प्रारम्भिक जीवन में तो अध्‍ययन नही किया क्‍योकि मुझे अपने विरासत में नही मिली हॉं यह जरूर है कि 9-12 तक की शिक्षा प्राप्‍त करने के दौरान काफी किस्‍से खाली पीरियड में सेक्‍स और अश्लील कहानी सुनने को मिलते थे। यहॉं मैने विरासत शब्‍द का प्रयोग किया है बताना चाहूँगा कि अ‍श्लील साहित्‍य का विकास हमारे अपने घर से होता है जो एक भ्रत से दूसरे भ्रत के भी चोरी छिपे या प्रत्‍यक्ष रूप से होता है। अर्थात आज हमें यह स्‍वीकार करने में नही हिचकना चाहिऐ कि हम कितना भी अस्‍वीकार करें किन्‍तु सेक्स शिक्षा के केन्‍द्र अपने हमारे घर है। जहॉं पर यह साहित्‍य कभी न कभी मिल जाते है। स्‍नातक से आप वयस्‍कता का भी आसय ले सकते है। इन साहित्‍यों का पढ़ना बुरा नही है किनतु गढ़ना बुला और अपने जीवन में अपनाना। मस्‍तराम की पहली कहना मुझे ब्‍लागिंग में प्रवेश करने पर ही किन्‍तु र्दुभाग्‍य कि मेरे आते ही मस्‍तराम की कहनियॉं समाप्‍त हो गई :)

जहॉं तक अपने स्‍वीकार किया है कि आपसी सहमति से गॉंव की हरयाली मे में क्‍या-क्‍या हो रहा है? अर्थात आज सेक्‍स शिक्षा वक्‍त के साथ गॉंव में भी पहुँच गई है, जिन गॉंवों में बिजली और टीवी और भी बहुत कुछ नही है। तो बच्‍चों के मध्‍य यह शिक्षा लाना कितना उचित है। आम सहमति से किया गया कृत्‍य निनदनीय नही मानता हूँ, किन्‍तु यहॉं विरोध असहमति के बाद हुऐ कृत्‍य के बाद हत्‍या तक की स्थिति की निन्‍दा करता हूँ।

क्‍स शिक्षा लाने की अपेक्षा संस्‍कार शिक्षा लाये जाने की जरूरत है जहॉं बचपन से सुआचरण की पद्वति को लाया जा सके, हमारे पुराने ऋषि पद्वति में 25 वर्षो युवकों की काम भवना दबी रहती थी आज क्‍या कारण आ गया कि 8 से 17 वर्ष की आयु में यह अपने चरम पर पहुँच कर अप्रकृतिक कृत्‍य तक पहुँच जाती है। आज के दौर में यह परिवर्तन हमारे परिवेश में संस्‍कारों की कमी को दर्शाता है। आज जरूरत है कि हम अपने पीढ़ी को संस्‍कार शिक्षा देने का प्रयास करे न कि सेक्‍स शिक्षा। हो सकता हो कि सेक्‍स शिक्षा आज की जरूरत हो किन्‍तु इसे स्‍कूलों में देने के बाजय वयस्‍क शिक्षा केन्‍द्र के जरिये दिये जानी च‍ाहिए ताकि अगर संवाद बात आये तो शिक्षार्थी खुल का प्रश्‍न भी कर सकें यह न हो कि कोई ऐसा प्रश्‍न आये कि मास्टर जी उत्‍तर देने में शर्म महसूस करें।

भुवनेश भाई ने ''दूध का धुला'' शब्‍द का प्रयोग किया है। दूध का दुले मै ही नही, हमारे राष्‍ट्रपिता महात्‍मागांधी से लेकर आज तक की कई पीढ़ी बहुत से लोग नही होगे। यहॉं बात फिर आचरण को लेकर आ जाती है कि आप अपने व्‍यक्तिगत जीवन में किसने भी खराब क्‍यो न हो किन्‍तु आप व्‍यवहारिक जीवन में उसका प्रयोग न करे तो आप खराब नही है। काम सबन्‍धी विषय निश्चित रूप से चर्चा होनी च‍ाहिऐ किन्‍तु यह जरूरी है कि चर्चा का स्‍थान और चर्चाकारों की स्थिति कैसी है। समाज विकृतियों से भरा है इस विकृति को सिर्फ और सिर्फ संस्‍कार शिक्षा द्वारा दूर किया जा सकता है। यह एक गम्‍भीर ममला तभी तक है जब तक कि यह स्‍कूल तक सीमित है इसे वयस्‍क शिक्षा का रूप दिया जाना चाहिऐ। मै अभी भी कहूँगा कि अगर संस्‍कार शिक्षा की बात पर हम जोर दे तो वयस्‍क शिक्षा की बात भी समाप्‍त हो जाती है। सेक्‍स शिक्षा का प्रवाह समय के साथ अपने आप हो जायेगा, क्‍योकि न मुझे और हॉं तक मेरा अनुमान है कि आपने या ज्‍यादातर लोगों ने सेक्‍स की औपचारिक शिक्षा पाई है।

Mar 10, 2008

सेक्‍स शिक्षा - Sex Education

सेक्‍स शिक्षा - Sex Education कितना जरूरी ?

आज के दौर में जिस प्रकार हमारा समाज पतन की ओर जा रहा है उससे तो यह पता चलता है कि अगर हम अपने परिवेश के अवाश्‍यक सुधार यह स्थिति और भी भयावह होती जायेगी। आज धीरे धीरे कुसंस्कृति को बचाने के लिये सेक्‍स शिक्षा जैसे षड़यंन्‍त्रों का आड़ लिया जा रहा है।

आज के पेपर में महिला दिवस की पूर्व संध्‍या पर एक चित्र प्रकाशित हुआ था जिसमें चलती बस में एक युवक अश्‍लील इशारे कर रहा था। क्‍या यही सेक्‍स शिक्षा का स्‍वरूप होगा? अगर संस्‍कृतिक पतन से समाज का उत्‍थान सम्‍भव है तो यह सोचना और समझना http://i143.photobucket.com/albums/r147/Nitajk/sexedu_1_1.jpgविचारकों को सबसे बड़ी भूल होगी।

स्‍कूली छात्रों में सेक्‍स शिक्षा पर जोर देना कोमल पौधों को गरम जल से सिंचित करने के समान होगा। क्‍योकि जो बालक और बालिकाऐं जिनके खेलने की दिन होने चाहिऐ हम उन्‍हे वासना की शिक्षा दे का प्रयास कर रहे है। कुछ दिनों पूर्व समाचार पत्र के एक खबर पढ़ा था कि कुछ 9 से 14 वर्ष के करीब आधा दर्जन बच्‍चों ने एक 12 वर्षीय बालिका के साथ बलात्कार किया। क्‍या आज के बालको में यौन शिक्षा इतनी जागृत हो गई है कि वह इस पर काबू नही रख पा रहे है या आज कल की फिल्‍में से इस वर्ग को इतनी सेक्‍स शिक्षा मिल जा रही है कि उन्‍हे इसके आगे कुछ सिखने की जरूरत नही है।

आज आत्‍याधुनिक पाश्‍चात सोच ही हमारे समाज के पतन का मुख्‍य कारण है, क्‍योकि आज के आधुनिक समाज में हमने हयाई छोड़कर बेहायाई अपना ली है और बेहया के लिया अच्‍छे और गलत में कोई अन्‍तर नही दिखता है। यही कारण है कि आज बहुत बड़ा वर्ग स्‍कूली शिक्षा प्रणाली में सेक्‍स शिक्षा का सर्मथन कर रहा है क